लम्स

एक लड़की थी
जो मुझे हर जगह छू ने देती थी।

बेतहाशा खूबसूरत!
वो औरत जो साड़ी पहनें, बिंदी लगाए,
तो उसकी घर की छोटी सी छोटी हरकत भी
बलैक एंड व्हाइट में कैद करने को जी लोलुप हो जाए।
गुंडो को मारना पीटना, अमीर ज़मींदारों जैसी ठाट-माट रखना, ये सब नही,
कभी कभी किसी औरत का आपके घर में
आपकी आघोश में होना ही
ये महसूस करा देता है कि
एक मर्द होंते हुए आपको कितनी ज़िम्मेदारियाँ
निभानी है और अगर ये औरत रही,
तो इस कमरे के बाहर भी
मै हर एक को जीत आऊंगा।

वो कभी कुर्ती में घूमती तो कभी मेरे कुर्ते में
कभी सिर्फ एक पतली सी टी-शर्ट पहने या कभी वो भी नही।
मैं माइकल एंजेलो होता अगर तो उसके बदन की हर शय को किसी मूरत में तराश देता,
हाँ मुझे इतना इश्क़ था उस से।
उसका उसके बदन के साथ मेरे पहलू में रहना
गुरूर था मुझ जैसे के लिए इस दुनिया को दिखाने के लिए कि ये,
ये औरत, ये जिस पे सबकी नज़रें गढ़ी है,
हाँ ये सिर्फ मेरी है।

जो उसकी आंखों की बेनमून कारीगरी से
ही ये कह देती थी की वो ला-हासिल है।
अपनी नज़्में सुनाए तो ये महसूस करा दे
कि तुम्हारी ज़िन्दगी में दर्द की अभी और ज़रूरत है।
वो जो अपने हाथो से दरगाह में दाल चावल खिलाए
तो दस्तरखां के लज़ीज़ पकवान भी अपने चाँदी के बर्तनों को कोसे।
वो जो अपनी खुशबू से घर को मंदिर और शबिस्ताँ को गुलपोश बनाए
तो ये तीस के बाद शादी वाली बात बेवकूफो सी नज़र आए।
किताब खाने में किताब उठाए तो लफ्ज़ उस से पूछते है
आप खुद कहानी हो, आप हमे क्यूँ पढ़ने आए?
अपने जिस्म को धूप में सूखने को रखे
तो उसे घूरने में टेबल पे पड़ी चाय जितनी बार रखो उतनी बार ठंडी हो जाए।

तुम मानोगे?
ऐसी लड़की! मुझे हर जगह छू ने देती थी।
अपनी रूह का रास्ता,
मेरी उंगलियों से ढूंढने को कहती थी।

~ जगजीत सलूजा

लम्स ~ the sense of touch

 

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