Kehkashaan – The story of Kashi

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आता है छुप के

तू मेरे दर पर

घायल दिल और धड़कन बंजर

धूप काशी के चेहरे पे छाँव के संग आँख-मिचोली खेल रही थी और काशी मोहतरमा दरवाज़े पे खड़ी ये गीत गुनगुना रहीं थी। काशी रात भर सोयी न थी। नासिर के इंतज़ार में थी। सुबह भी हो गई जब वो आया नही तो अपना वक्त गुज़ारने को दो घड़ी चौखट पे खड़ी रह गई। तभी टेलीफोन की घंटी बजी, सामने से अंजुम बी की आवाज़ आई, “काशी अंजुम बी बात कर रही हूँ, कैसी हो?”

‘में ठीक हूँ खाला, आप कैसी है?”

“बस यही कहने को फोन किया था की तू ज़रा घर आ। ये तसनीम को समझा ज़रा आ के। इसे खुदा जाने क्या धुन चढ़ी है माना रात की जॉब में थोड़े पैसे ज़्यादा मिलते है मगर अब लड़की घर से रात को बाहर जाए और सुबह घर लौटे ये तो कोई अच्छी बात नही। मोहल्ले वाले देखते है। ज़िद्द करके वो कई रात अपनी जॉब पे चली ही गई। अभी आने ही वाली होगी। बेटा तू शाम में फ़ारिग़ हो तब घर आ जाना, दोपहर में सोएगी ही ये।”
खाला आप फिक्र ना करे। मैं आ जाऊँगी शाम मे।”

“ठीक है बेटा। खुदा हाफ़िज़।”

“जी अल्लाह हाफ़िज़।”

कहकशाँ फोन रखते ही भिन्न-भिन्न प्रकार के खयालो में खो गई। कई गलत बिचार और शक़ उसके मासुम से मन में पैदा होने लगे। नासिर भी कल शाम से अब तक लौटा ना था।

तसनीम दिखने में काफी सुन्दर थी। पढ़ी लिखी थी, बोलने चालने के ढंग में भी काफी स्मार्ट थी। शादी के शुरुआती दिनों में तसनीम का घर पे आना जाना थोड़ा ज़्यादा ही था। नासिर को छेड़ने उनकी जी हुजूरी और खातिर करने का शौक़ था उसे।

एक रोज़ आंगन में बैठे काशी अचार सुखा रही थी और तसनीम और नासिर वही बैठे अपनी अठखेलियो में मशरूफ थे। काशी कुछ बोलती ना थी। वो दोनो जो बाते करते उनकी बातो पे बीच बीच में बस मुस्कुरा दिया करती। तभी तसनीम ने काशी को तंज़ करने के लहज़े में कहा, “हाँजी नासिर जी, अब आप कहाँ सुनने लगे हमारी। अब भाभी जो आ गई है। अब आप थोड़ी मिलेंगे हमे रात भर गप्पे लड़ाने को।”
नासिर का चेहरा थोड़ा सा उतर गया और कहने लगा, “नही नही ऐसी कोई बात नही, हम तीनो बैठ कर गप्पे मारा करेंगे हर जुम्मे के जुम्मे।”
“हम तीनो क्यों? हमे तो सिर्फ आप चाहिए।”

नासिर एकाएक चौक उठा और तसनीम को हाथ से इशारा करके कहा की वो काशी के सामने इस तरह की बात ना करे। काशी ने भी ज़्यादा ध्यान नही दिया ये सोच कर की दोनो भाई – बहन है, बचपन से साथ रहे है तो शायद इस तरह की बातें वाजिब है।

दरवाज़े पे दस्तक हुईं। काशी अपने ख्यालो के दरिया से चौकी और दरवाज़ा खोलने को उठी। नासिर आया था। बिना काशी से कुछ कहे वो घर मैं दाखिल हो गया। आंगन में पड़ी चारपाई पे जा के बैठे जुटे उतार रहा था और पानी का गिलास लिए उसके समीप खड़ी हो गई। नासिर पानी पीते हुए काशी की ओर ही देख रहा था। फिर बिना कुछ कहे अपना कुर्ता ठीक करते हुए वो वहाँ से खड़ा हो के अपने कमरे मे जा कर सो गया। काशी कुछ पूछे उस से पहले ये सब हो गया। काशी भी अपने कमरे में दाखिल हुईं। नासिर लेटा हुआ था आँखेँ बंध कर के। काशी ने अपने बाल खोले, अपनी बूंदे उतारी और पैर सीधे किए वही पलंग से सहारा लिए सिलिंग की तरफ देखने लगी।

“मैं बारह साल की थी तब। अब्बा हमे अपनी पीठ पे बिठा के घुमा रहे थे आंगन में तभी दरवाज़े पर उनके लिए एक पैग़ाम आया और उसे सुनते ही हमे ज़मीन पे उतार के, अम्मी से बिना कुच कहे वो चल दिए। अब्बू को अक्सर ऐसे पैग़ाम आया करते थे और वो अम्मी को बिना बताए चले जाया करते थे। अम्मी हर रोज़ अंजान ही होती थी उनके जाने की वजह से। अम्मी रसोई में खड़ी देख रही थी जब अब्बू वहाँ से निकले। बहुत रात गए करीब 11 बजे फिर दस्तक हुईं। एक लड़का जिसने बताया की अब्बू को अस्पताल लेके गए है। हम जब तक वहाँ पहुँचे अब्बू चल बसे थे। अम्मी आज भी अपने आप को कोसती है की काश वो उनके जाने की वजह पूछ लेती तोह शायद आज वो उनके साथ ही होते।”

“तुम्हारे अब्बू के गुज़रने से हमे हमदर्दी है मगर तुम फिक्र मत करो। मुझे कुछ नही होने वाला।”

काशी नासिर को पीछे से गले लग गई और अपना चेहरा उसके कंधो पे रख के बोली, “अल्लाह हमेशा आपको सलामत रखे मगर आप..” काशी के आंखों से आँसू आ गए। नासिर आँख बंध किए लेटा रहा।

“आप हमे इखतिला करके जाया करे। हम रात भर सो नही पाते। आपकी फिक्र लगी रहती है बस। मन में ना जाने कैसे कैसे खयाल आते रहते है।” काशी वही नासिर के कंधो पे सर रखे हुए सिसकती हुई ही सो गई। नासिर ने मगर उसके रुखसारो पे प्यार से हाथ ना रखा।

***

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अब मुझे कोई इंतज़ार कहाँ

वो जो बहते थे आबशार कहा।

कहकशाँ अंजुम बी के घर की सीढियाँ चढ़ रही थी जब ऊपर से रेडियो पे रेखा भारद्वाज की आवाज़ मे रचे इस गीत के बोल उसके कानो में पड़े। आसमानी रंग का दो मंज़िला घर था अंजुम बी का। नीचे किरायेदार रहा करते थे और ऊपर अंजुम बी और तसनीम। तसनीम के अब्बा का दो साल पहले हैजे की बीमारी में इंतकाल हो गया था। तब से ही तसनीम का इधर काशी के घर आना कम हो गया था। घर चलाने का बोझ तसनीम पे आ गया था। अंजुम बी कसीदे का थोड़ा बहुत काम कर लिया करती थी। किरायेदार पुराने थे तो वहाँ से बस 300 रुपये महीने के आते थे।

“कैसी हो तसनीम? तुम्हारी अम्मी ने बताया तुम्हारी नौकरी लग गई है नई। मुबारक हो!”

“शुक्रिया बाजी। अम्मी ने आपको क्यूँ बताया? अम्मी तो खुद नाखुश है मेरी इस नौकरी से। इनके घर में रोटी पके या ना पके इससे ज़्यादा इन्हें मोहल्ले वालो की फिक्र है।”
तसनीम कपड़ो की तय लगा रही थी। काशी की ओर सीधा मुँह रखके बात भी नही कर रही थी।
“कैसी बात करती हो तसनीम? तुम्हारी अम्मी तो सबसे ज़्यादा खुश है की उनकी बेटी अब अपने पैरो पे खड़े रहने के लायक हो गई है। उनसे ज़्यादा खुशी तो तुम्हे भी ना होगी इस नई नौकरी की।”
“तो पूछिए उनसे की ये हमारी जाने के वक़्त पे मुँह फुलाए क्यूँ बैठी रहती है?”

“दरअसल तसनीम मसला नौकरी के वक्त का ही है। तुम्हारी अम्मी को।फिक्र लगी रहती है जब जवान बेटी रात भर घर से बाहर रहे।”

तसनीम ने बीच में काटते हुए कहा, “हाँ तो कौन सा ऐश करने जाती हूँ बाहर। कौन इंसान होगा भला जो रात भर अपनी नींद बिगाड़ कर काम करना चाहता होगा। रात के काम में 5 हज़ार ज़्यादा मिलते इसीलिए ही तो करती हूँ।”

तभी अंजुम बी ज़रा ऊँची आवाज़ में कहने लगी, “अर्रे पाँच पैसे कम मिले तो मिलने दो। कम से कम मोहल्ले वालो की बातें तो ना सुननी पड़े मुझे। अब्बा भी नही है इसके अब। निकाह कराने में कितनी मुश्किल आएगी जब पता चलेगा की लड़की रात को नौकरी पे जाती है।”

“निकाह निकाह निकाह” तसनीम कपड़ो को फेकते हुए झल्ला के बोली। फिर धीरे से काशी की ओर नासर करके चिढ़ के बोली, “निकाह करु भी किस से? आपकी चहीति हड़प कर गई उसे तो।”

काशी सन को रह गयी। मुठ्ठी बंध कर वो चुप चाप ज़मीन की ओर देखने लगी। अंजुम बी और तसनीम आपस में बहस कर रहे थे जो काशी के कानो तक सुनाई नही पड़ती थी अब।

“अपना खयाल रखना। मैं चलती हूँ।”

ये कह कर काशी उठी और सीधा अंजुम बी से बीना कुछ कहे दरवाज़े से बाहर निकल गई। अंजुम बी उसे रोक ना पाई और तसनीम को और खरी-खोटी सुनाने लगी। चार सीढियाँ उत्तर कर काशी वही बैठ गई और उसकी आंखों से अश्रुधारा बहने लगी। तभी ऊपर से अंजुम बी की तसनीम पे चिल्लाते हुए एक आवाज़ आई, “नासिर को कहकशाँ पसंद नही, जानती हूँ मगर तू अब उसका खयाल करना छोड़ दे। सुना है वो भी रात रात भर घर से बाहर रहता है। कही तुम दोनो मेरी इज़्ज़त मिट्टी में ना मिलाओ और उस लड़की की ज़िन्दगी भी तबाह ना कर दो।”

कहकशाँ ये सुनते ही वहाँ से उठ खड़ी हुई और तेज़ी से अपने घर की ओर दौड़ गई।

***

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कहकशाँ पाँच बार की पक्की नमाज़ी थी। उसके अब्बा ने उसे बचपन में ही ये सीख दे दी थी। रोज़े भी वो बड़े चाव से रखा करती थी। घर आते ही वो अपने दिल को शांत करने के लिए दुआ में बैठ गई। वही दुआ खत्म हुईं की नासिर बाहर आके बैठा और बोला, “काशी ज़रा चाय बना दो एक कप। बहुत सर दुख रहा है ना जाने क्यूँ।”

काशी फर्श से उठी और डाइनिंग की कुर्सी पे हाथ रखते हुए पूछने लगी, “आप मुझे बताते क्यूँ नही कि आप रात भर कहाँ रहते है? सर भी शायद इसीलिए दुखता होगा रात भर सोए जो नही है आप। ये दिन भर की निन्दो में सुकून नही मिलता।”

“तुम सवाल मत करो मुझसे फिलहाल। अपने शोहर से इतने सवाल करना ठीक नही। तुम चाय बना लाओ पहले।”

नसरीना को बीपी की बीमारी थी। कई बार उनका बीपी लो हो जाता था। उनका कमरा अंगनाई से सट्टा हुआ ही था और खिड़की से वो नासिर और काशी की बातें सुन रही थी। तभी वो अपने कमरे से बाहर आते हुए बोली, “उसका हक़ है तुझसे पूछना। तू बताता क्यूँ नही है की तू रहता कहाँ हैं रात रात भर? मुझे खुद भी यही सवाल करने थे तुझसे। कहकशाँ बेचारी सो नही पाती पाती रात रात भर और तू है कि ठीक से बात तक नही कर रहा उस से।”
“अम्मी आप बीच में ना पड़े। आप आराम करे प्लीज़।”

“में कर लूंगी आराम। तु जवाब दे पहले उसे।”

नासिर तंग हो कर डाइनिंग से उठ गया और बिना काशी की ओर देखे घर के बाहर निकाल गया।

काशी अपना उदास चेहरा लिए अपने कमरे में चली गई। नसरीना ने उस से कुछ ना कहा। काशी ने देखा की नासिर अपना फोन घर पे ही भूल गया है। नासिर यूँ अपना फोन कभी काशी के हाथ में नही दिया करता था। काशी ने सोचा ये सही वक़्त है अपने शक़ की सच्चाई तराश लेने का। लेकिन फोन में तो काही को कुछ भी आपत्तिजनक नही मिला। तभी उसकी नज़र फर्श पे गिरे हुए एक झुमके पे पड़ी। काशी ने झुमका उठाया तो मालूम हुआ की वो झुमका काशी का नही था। बल्कि ये वही झुमका था जो काशी ने तसनीम की पिछली सालगिरह पे उसे तोहफे में दिया था। काशी सन्न सि हो कर रह गई। झुमका अपनी मुठ्ठी में दबाए वो खिड़की से अंगनाई की ओर देखने लगी। सोचा की फौरन अंजुम बि के घर दौड़ जाए मगर रोक लिया उसने उस खयाल को। आंखों से आँसू बहने लगे। काशी अंगनाई में आके सुतून के सहारे खड़ी होकर शाम के ढलते सूरज में अपनी परेशानियों और मुक़द्दर से हो रहे है कई सवालो को वही उस में डुबाने की फ़िराक़ में रही।

***

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सूरज के ताप से लरज़ती दोपहर थी। गाली मोहल्ले में मानो जैसे कर्फ़्यू सा लग गया था। धूल की आंधी उड़ रही थी सड़को पर। टुक-टुक वाले पीपल के पेड़ तले बैठे इंतज़ार करते थे उन मुसाफिरों का जो शाम तक ना आने वाले थे। नसरीना अपने कमरे में पड़ी सो रही थी। कहकशाँ बाहर अंगनाई के एक छाव वाले हिस्से में बैठ कर गुलज़ार साब की नज़मो पे अपनी उँगलियाँ फेर रही थी। दोपहरों का अजीब सा सन्नाटा उसे तब से पसंद था जब से वो बनारस में रहा करती थी। तब वो घाट पे बने मंदिरो की छाव वाली जगहों पे अपनी सहेली मुबारक के साथ जा के बैठ जाती थी। दोनो फिर अपनी अठखेलियों में शाम तक का वक़्त गुज़ार दिया करती थी।

“मुझे कुछ दिनो से उलझन हो रही है बड़ी।” काशी ने मुबारक सीढ़ी पे पड़े एक सूखे पत्ते को हाथ में लेते हुए कहा।

“कैसी उलझन?”

“अब्बा का यहाँ कर्ज काफी बढ़ गया है। जोधपुर वाली अंजुम फुफो बुला रही है उन्हें वहाँ की हमारा सारा परिवार वहाँ आ जाए और अब्बा वहाँ पे नया कोई काम देखे। अंजुम फुफो से काल फोन पे बात हो रही थी तो उन्होंने मुझे चिढाते हुए कहा कि अब्बा के नए काम के साथ साथ उन्होंने मेरे लिए भी कुछ देख रखा है। मैंने पूछा क्या देख रखा है आपने? तो बोली अब आप जवान हो गई है काशी जी, हमने आपके लिए आपके शोहर साब देख रखे है। मैं तो घबरा सि गई और फोन फौरन अम्मी को दे कर उस कमरे से चली गई।”

“अर्रे रे, शादी तो ठीक है, वो तो मेरे घरवाले भी पीछे पड़े है ये दो घाट छोड़ के जो शिव जी के मंदिर के पीछे वाली मस्जिद के मौलवी के बेटे से करने के लिए। में ही टाल दिया करती हूँ। लेकिन यहाँ बात विरह की है काशी। तेरे मेरे विरह की।”

“हाँ मुब्बू, मुझे ये बात भी खाए जा रही है की तू भी नही होगी वहाँ तो में घंटो किस से बतियाया करूँगी? और ऊपर से में जो यहाँ उर्दू में मेजर्स करना चाहती हूँ BHU से वो भी संभव ना होगा। हमे तो अभी कितने उपन्यास, ग़ज़ले, कहानियां पढ़नी बाकी है। उनपे रिसर्च करनी है। जोधपुर जाते ही हमारे हर एक शौक़ को आग लगा दी जाएगी और सीधा शोहर के घर भेज दिया जाएगा।”
काशी का यह कहते हुए मुँह छोटा हो गया था। वो गंगा में खड़ी के नाव की ओर टिकटिकी लगाए देखने लगी। मुबारक भी कुछ देर ना बोली। दोनो अपने अपने आने वाले कल के लिए परेशान थी। फिर कुछ देर बाद मुबारक माहौल को हल्का बनाने के इरादे से काशी को चुपके से गुदगुदी करने लगी। काशी मुकुराने लगी तभी मुबारक बोली, “तू घबरा मत पगली। अभी तो हमारा साथ में लखनौ जाने वाले प्लान भी बाकी है। और वैसे भी मेरा जो सपना था तेरी शादी मैं “सात समंदर पार” पे डांस करने का वो भी अब जल्द ही पूरा होने जा रहा है।” मुबारक हँसने लगी। काशी ने उसकी छोटी खीचते हुए कहा कि, “तू ज़्यादा मज़ाक़ मत कर। अभी मैंने भी नागिन वाला डांस करना है तेरी मेहँदी पे।”

दोनो हँसने लगी ज़ोर से। घाट पे उनकी हँसी की रौनक में गंगा जी की ना जाने कितनी शामें गुज़री थी और ना जाने और कितनी बाकी रह गई थी।

***

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शहर बदलने की जल्दबाज़ी मे काशी की पढ़ाई छूट गई। उसकी बारहवीं की परिक्षा मे बस दो महीने का वक़्त बाकी था जब उसके अब्बा उसे जोधपुर ले आए। यहाँ आते ही वे किच महीने अंजुम बी के घर ही ठहरे। तसनीम और काशी में काफी अच्छी दोस्ती भी हो गई थी। काम में ज़रा स्थिरता आने के बास काशी के अब्बा ने दो गलि छोड़ कर अपना दो मंज़िला घर भी बना लिया था।

तसनीम और नासिर ने एक ही कॉलेज से बि.ए पास किया था। वो दोनो साथ में अब एस. एस. सी की भी परीक्षा की तैयारी कर रहे थे इस वजह से नासिर अक्सर अंजुम बी के घर आता जाता रहता था। एक रोज़ काशी की अम्मी भी वही थी जब नासिर अंजुम बी के घर मौजूद था। काशी की अम्मी को नासिर बेहद पसंद आ गया। पढ़ा-लिखा अछा, जवान, अच्छी कद-काठी और तीखे नैन-नक्श थे उसके। काशी की अम्मी ने नासिर के घर बात चलाने का ज़िम्मा अंजुम पे छोड़ दिया। ना तसनीम ना ही काशी को इस मामले की कोई खबर थी। एक रोज़ काशी और नासिर के घर वालो का मिकना तय हुआ और उसी मुलाकात में नासिर और काशी का निकाह पक्का कर दिया गया जिसकी खबर उन्होंने नासिर और काशी को बाद में दी। काशी और नासिर दोनो के पास अपनी अपनी वजह थी निकाह ना करने की मगर घरवालो के आगे वो झुक गए और कुछ ही दिनों मे उनका निकाह पढ़वा दिया गया।

काशी में यूं तो कोई कमी ना थी मगर नासिर को एक पढ़ी लिखी लड़की उसकी बीवी के रूप में चाहिए थी। और नासिर की अम्मी को ऐसी लड़की जो बस घर के काम में ध्यान दे और उनके बेटे का खयाल रखे। यही देखते हुए उन्हें काशी पहली नज़र में ही पसंद आ गई। नासिर अक्सर टोक दिया करता था काशी को उसके कम पढ़े लिखे होने की बात पे। काशी अपनी तहज़ीब के मामले में नासिर से दो कदम आगे थी मगर अंग्रेज़ी में उसका हाथ ज़रा कच्चा था। प्यार की पहली सीढ़ी दोस्ती है और यहाँ तो वो सीढ़ी पे काशी और नासिर शादी के बाद भी लाँघ नही पा रहे थे।

नासिर की शहर की एक अच्छी कंपनी में नौकरी थी। वो दिन भर वही रहता था। शाम को आते ही अपने दोस्तो के साथ गली के नुक्कड़ पे वक़्त गुज़ारा करता और रात पड़े खाना खा कर अपनी परिक्षा की एक दो घंटे तैयारी करके सो जाता। काशी उसका उसे वक़्त देने का इंतज़ार करती रहती मगर हर रोज़ उसे निराशा ही हाथ लगती। काशी सारा दोष अपने पढ़े लिखे ना होने को देती। उसे लगता जैसे अंग्रेज़ी उसे आ गई तो वो अपने शोहर को भी अपने काबू में कर लेगी।

इक रोज़ काशी ने नासिर के अब्बा से बात करने को ठान ही ली।

***

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नासिर के अब्बा, हारून मियां को एक बेटी की बेहद तलब थी मगर अल्लाह ने वो पूरी ना की। कहकशाँ के आने के बाद हारून मियां उसी को अपनी बेटी की तरह प्यार किया करते थे। कहकशाँ भी अपने अब्बा की दवा-दारू का पूरा खयाल रखा करती थी। कहकशाँ जब भी हारून मियां को अब्बा कह के पुकारती, हारून मियां का दिल मोम के मानिंद पिघल जाता। हारून मियां की सुमेर बाज़ार की धान की मंडी में अपनी आटे की चक्की थी जो उन्हें अपने बाप दादा से विरासत में मिली थी।

काशी अब्बा का ही इंतज़ार किए बैठी थी। 6 बजने को थे। हारून मियां किसी भी वक़्त अब आते ही होंगे। अचानक किवाड़ पे दस्तक हुई। कहकशाँ दौड़ के खोलने गई। अब्बा ही थे। काशी ने उनका थेला उनके हाथ से लिया और हाथ में नीम्बू पानी पकड़ाया और आस भरी नज़रे लेके वही पास में खड़ी हो गई।

“क्या बात है कहकशाँ बेटी, कुछ कहना चाहती हो तुम?”

“नही नही अब्बा। कुछ नही। आप बताये, आप का दिन कैसा गुज़रा? वो मशीन में जो कल खराबी आ गई थी वो ठीक हो गई आज?”

कहकशाँ को गिलास वापिस देते हए बोले, “हा बेटा वो तो ठीक हो गई और दिन भी काफी बढ़िया रहा। असलम चाचा भी आए थे दोपहर में।”

“जी अच्छा।”

“मगर तुम्हारी आँखों में हमे कोई इल्तजा नज़र आ रही है। बताओ क्या बात है?”

“जी वो में चाहती हूँ कि आप मेरे लिए अंग्रेज़ी सीखने की कुछ किताबें ले आए। मगर आप नासिर से मत बताइयेगा की मैंने आप से ये किताबें मंगवाई है।” कहकशाँ एक ही साँस में सारी बात बोल गई।
“अर्रे इतनी सि बात बेटी और तुम इतनी घबराई हुई हो! हम कल ही ला देंगे तुम्हारे लिए किताबें। तुम बेफिक्र रहो।”

कहकशाँ खुशी से झूम उठी।

“शुक्रिया अब्बा! आप बहुत अच्छे है। आज मैं और अम्मी मिलके आपके लिए निहारी बनाएंगे।”

“बेटा अगर ये बात है तो हम रोज़ तुम्हारी बात मान लिया करेंगे।”

कहकशाँ इसी बात पे खुश होते हुए रसोइ में निहारी की तैयारियों के लिए चली गई। और साथ में आँखों में कई ख्वाब बोने लगी की अब कुछ ही दिनों में उसके और नासिर के बीच सब बेहतर हो जाएगा और उसे अंजुम बी से तसनीम के बारे में कहने की कोई ज़रूरत नही होगी फिर।

***

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काशी अब दिन भर घर के काम और अपनी अंग्रेज़ी सीखने की किताबो में व्यस्त रहती। उसने नासिर से सवाल करना छोड़ दिया। वो सोचती रहती की बस वो अंग्रेज़ी सीख जाएगी तो सब एकदम से ठीक हो जाएगा। नासिर को लगा की काशी भी उसके लिए बेपरवाह होती जा रही है तो वो घर से दूर रहने में और छूट लेने लगा। पहले जो कभी एक दो दफे बता दिया करता था कि वो कहाँ जा रहा है, अब उसने वो भी बताना छोड़ दिया था। बस हफ्ते में दो तीन रात ही वो घर पर रुकता था। काशी ने अपनी अंग्रेज़ी सीखने वाली बात नासिर से छुपा रखी थी। नसरीना से भी बतला रखा था की वो नासिर से कुछ ना कहे।

नसरीना की एक सहेली थी जो वही पास के लूणी गाव में रहा करती थी। नसरीना अक्सर दो-तीन महीनों में एक दफे उसले गाव चले जाया करती थी। फिर वही दो-चार दिन रहती और नासिर उसे लेने आ जाया करता। उसका नाम हीरा बानो था। हीरा बानो का कल ही फोन आया था की उनकी तबियत ज़रा ठीक नही है और उनका बेटा भी काम के सिलसिले में जयपुर गया हुआ हौ तो कुछ दिन नसरीना उनके पास चली जाए और उनका खयाल रखे।

नासिर दोपहर को छुट्टी ले कर घर आ गया। काशी ने उसे रोटियाँ परोसी और नसरीना अपना सांमांन लिए अंगनाई में आकार खदी जो गयी।

“नासिर तुम खयाल रखा करो कहकशाँ का। अब ज़िम्मेदारिया बढ़ने वाली है तुम्हारी। काशी बेटा तुम भी अपने खाने-पीने का खयाल रखना। में हिरा बानो की तबियत ठीक होते ही लौट आउंगी।
नासिर के समझ में बात ज़्यादा आयी नही ना ही उसने वहाँ पुछना मुनासिब समझा। उसने हाथ धोए और अपनी अम्मी का सामान उठा के मोटरसाइकिल की ओर चला गया। अम्मी की रुखसती के बाद काशी अंगनाई में लगी चारपाई पे आकर बैठ गई। काशी आज खुश थी। उसे लगा की अब अम्मी ने पहल कर दी है तो उसे भी अब नासिर को बता देना चाहिए। चार बजे के क्ररीब नासिर वापिस आ गया। धूप बहुत होने के कारण काफी थक चुका था वो। आते ही हाथ-मुँह धोया और कुर्ता उतारके बाहर चारपाई पे लेट गया और काशी वही शिकंजी लेकर हाज़िर हुई। नासिर चारपाई पे बैठा शिकंजी पीने लगा तभी उसे अम्मी की बात याद आई और उसने पूछा, “ये अम्मी कौनसी ज़िम्मेदारियों की बात कर रही थी? मैं उनकी बात कुछ समझ नही पाया। तुम बताओ, क्या मामला है ?””
“जी वो, आई एम पेग्नन्ट” काशी ज़रा अटकते हुए बोली।

“क्या? क्या कहा तुमने?”

“जी आई एम प्रेग्नेंट।” काशी नज़रे झुकाए खुशी से शर्माते हुए बोली।

“ये तुम क्या सच कह रही हो?”

“जी वो दो रोज़ पहले दोपहर को उल्टी हुई थी तब अम्मी को शक़ पड़ गया था। फिर शाम को डॉक्टर के पास लेके गई थी वो। आज सुबह ही रिपोर्ट आई है। दूसरा माह चल रहा है अभी।”

नासिर सर पे हाथ रखे हुए ज़मीन की ओर ताकने लगा। काशी ज़रा चिंतित हो गई। उसे लगा वो जैसे ही ये खबर देगी अंग्रेज़ी में तो नासिर खुश हो जाएंगे। लेकिन यहाँ तो नासिर ने ना उसकी अंग्रेज़ी पे गौर किया ना ही उसके प्रेग्नेंट होने पे।

नासिर बिना कुछ कहे ही वहाँ से उठकर बाहर चला गया।

***

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“सुनो तुमसे ज़रूरी बात करनी है आज एक।”

“हाँजी हाँजी कर लेंगे पहले हमने आपके लिए ये जो बिरयानी बनाई है इसे चख के तो बताइये।”

“बिरयानी बाद में खा लेंगे तसनीम तुम पहले मेरी बात सुनो।”

“अरे ऐसी तो कौनसी बात है कि तुम मेरि बनायी बिरयानी से मुँह फेर रहे हो? कहो क्या बात है?”

नासिर तालाब की पाल से उतर गया और काफी विवश चेहरा लिए उसने तस्नीम से काशी की प्रेग्ननसी के बारे में कह दिया।

“क्या कहा तुमने? काशी प्रेग्नेंट है? मगर तुमने तो कहा था मुझसे कि तुम उसे हाथ तक नही लगाते हो नासिर फिर ये प्रेग्नन्सी की बा कहाँ से आयी? आर यु श्योर ये बच्चा तुम्हारा है या काशी किसी और के पास जाती थी?”

“चुप करो तसनीम। काशी किसी के पास नही जाती थी। हाँ वो बच्चा मेरा ही है। कभी कभी मेरे काशी के साथ जिस्मानी तालुकात रहे है। ये मेरि गलती है। मैंने झूठ कहा है तुमसे।”

तसनीम नासिर के कंधे को झनझनाते हुए बोली, “झूठ? तुम्हे लगता है ये सिर्फ एक झूठ है? पहले तुमने उस गवार से शादी करके हमारे इश्क़ की जो तौहीन की थी वो क्या कम थी जो अब तुम इस बच्चे को पैदा करके अपनी शादी पे ज़िंदगी भर की मोहर लगाना चाहते हो? मैं अपनी माँ से रोज़ लड़ कर बाहर निकलती हूँ। रात भर नौकरी पे जाती हूँ ताकि तुम्हारे साथ वक़्त बीता सकू। मैं झल्ली इस उम्मीद में थी की तुम उसे तलाक दे कर मुझसे शादी कर लोगे अपनी नई नौकरी लगने के बाद मगर आपने तो यहाँ नया गुल खिला लिया जनाब।”

तसनीम रोते हुए तालाब की पाल पे जा कर बैठ गई। नासिर उससे पीठ फेरे हुए वही खड़ा हुआ था।

“तुमने मेरी ज़िन्दगी बर्बाद करदी नासिर। अल्लाह तुम्हे कभी माफ नही करेगा।”
“खुदा के वास्ते तुम मुझे बद-दुआ मत दो। आगे ही ज़िंदगी में कम मुसीबतें नही है। मैं मानता हु मैं गुनहगार हूँ तुम्हारा मगर मुझपे यकीन करो ये बच्चा मैं होने ही नही दूँगा। तुम फिक्र मत करो। मुझे थोड़ा वक़्त दो। इस बच्चे की वजह से मैं हमारा राबता खत्म नही होने दूँगा।”

नासिर मुड़ के तसनीम के कंधो पे हाथ रखे हुए उसे ये बातें समझाने लगा। तसनीम ज़मीन की ओर देखते हुए सिसक रही थी बस।
“मुझे नही मालूम नासिर मैं तुमपे भरोसा कैसे करु अब। तुमने उस औरत से मोहब्बत का इंकार किया था और तुम उसके साथ सोते थे? में कैसे यकीन करु तुमपे नासिर? मैं कैसे करु?”

तसनीम फुट फुट कर रोने लगी तभी नासिर ने उसे बाहों में ले लिया। तसनीम वही उसके सीने पर सर रखके रोती रही और नासिर उसे समझाता रहा, “तुम फिक्र मत करो तसनीम मुझे अपनी गलती का एहसास है। ये बच्चा इस दुनिया में नही आएगा। मैं जल्द ही काशी को तलाक दे दूंगा और कुछ महीनों में तुम मेरे घर आ जाओगी। अल्लाह पे भरोसा रखो।”
“भरोसा कैसे करेंगे हम अल्लाह पे? हमारी खुद की तबियत ठीक नही है कुछ दिनों से। दो दिन में तीन बार उल्टी हुई हैं हमे। हम कल ही अस्पताल जाएंगे। तुम साथ चलना मेरे।”

नासिर ने और सवाल करना मुनासिब ना समझा और तसनीम की पीठ पे हाथ फेरते हुए उसे कहने लगा, “जी मैं ले चलूँगा आपको। आप रोइये मत बस। सब ठीक हो जायेगा। “

***

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नसरीना बी तीन दिन बाद ही घर आ गई। काशी को उनके आने पे बेहद खुशी हुई। उसे घर के कई सारे काम करने में तकलीफ हुआ करती थी और नासिर उसका बिल्कुल हाथ ना बटाता था। और हारून मियां तो सारा दिन अपनी आटे की चक्की पे रहा करते थे।

“वहाँ हीरा का बेटा दफ्तर से छुट्टी लेकर घर आ गया अपनी माँ की सेवा के लिए। तभी हीरा ने कहा की मैं अपनी काशी की देखभाल के वास्ते वापिस चली जाऊ।”

“ऐसी कोई ज़रूरत नही थी अम्मी। मैं संभाल ही रही थी यहाँ सब कुछ ठीक से।”

“बेटा तु रहने दे। तेरी इस छूट ने ही नासिर को बेपरवाह बना दिया है। तू बिल्कुल भी डाँटती नही है उसे। उसे खयाल रखना चाहिए तेरा।”

“वो रखते ही है मेरा खयाल ऐसी कोई बात नही है। सुबह शाम वो मुझे पपीते और अनानस का रस निकाल के देते है।
“चलो ठीक है। अल्लाह खैर करे। मैं ज़रा अंजुम के घर जा कर आती हूँ। बड़े दिन हो गए उसके घर का रास्ता ही नही देखा। अभी तस्नीम भी नही होगी घर पे तो फुर्सत से बात हो जायेगी। तुम खयाल रखना अपना। मैं आ कर दाल चावल चढ़ा दूँगी। तुम आराम करो।”

“नही नही आप जाये मैं देख लूँगी। खैरियत से जाये आप। याद दीजियेगा उन्हें भी मेरी।”

कहकशाँ अपने काम में व्यस्त हो गई। दोपहर को थोड़ी देर सो गई। करीब शाम 5 बजे किवाड़ पे दस्तक हुई। दहलीज़ पे एक लिफाफा पड़ा हुआ था। कहकशाँ ने गली में झाँकने की कोशिश की मगर ऐसा कोई इंसान दिखा नही जो लिफाफा छोड़ के गया हो। सफेद रंग का लिफाफा था, शायद किसी अस्पताल से आया हुआ लग रहा था। कहकशाँ ने उसे उठाया और दरवाज़ा बंध कर लिया।

***

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सात महीने गुज़र गए। सितंबर का महीना था। बारिशो के मौसम का आग़ाज़ था। कहकशाँ की डिलीवरी किसी भी दिन हो सकती थी। हारून मियां पिछले 15 दिन से दुकान बंध करके घर पे ही रहा करते थे काशी की देखभाल के वास्ते। नासिर को पुराना दफ्तर छोड़े एक महिना गुज़रा गया था। वो दिन भर नई नौकरी की तलाश में रहता था और रात भर दोस्तो के नाम पर आए-गए बाहर रहा करता था।

“ज़रा सुनो, मुझे आपसे एक बात करनी थी कई दिनों से। आप ज़रा कमरे में चलिये तो।”

काशी टी.वी देख रही थी तभी पीछे से नसरीना हारून मियां को आके कहने लगी।

“क्या बात है नसरीना?”

“आप चलिये तो। काशी को यही रहने दे। आप आइये।”

हारून मियां और नसरीना दोनो अपने कमरे में आके बैठे।

“क्या बात है कहो?”

“अब आपको किस मन से बताउ मैं ये बात? अल्लाह ने हिम्मत दी थी तो इतने दिन मैं ये बात अपने सीने में छुपाए बैठी थी मगर अब इस राज़ को बताने में और देर नही कर सकती मैं।”

हारून मियां नसरीना के कंधे पे हाथ रखते हुए बोले, “घबराओ मत नसरीना, बताओ क्या बात है?”

“दरअसल पिछले महीने अस्पताल से एक लिफाफा आया था। नासिर और कहकशाँ उड़ वक़्त घर पे मौजूद नही थे। काशी जिस डॉक्टर से इलाज करवा रही हौ वहां से कुछ रिपोर्ट्स आई थी जिस में लिखा था की काशी लगातार ऐसी कोई चीज़ खा रही है जिस से बच्चे को नुकसान पहुँच रहा है। उस रिपोर्ट में किसी रसायन का भी नाम लिखा था जो मेरे पल्ले नही पड़ा लेकिन उस में लिखा था कि डिलीवरी के वक़्त काशी को बेहद दर्द हो सकता है और बच्चे की सलामती पे भी सवाल है। मुझे हर दम डर लगा रहता है काशी के लिये। हर नमाज़ मैं मेरी बच्ची के लिए ही दुआए निकलती है। कही वो घबरा ना जाये इसके लिए अब तक उसे बताया भी नही है। नासिर को काशी की यूँ भी कोई फिक्र नही रहती।”

“नसरीना तुमने इतनी बड़ी बात मुझसे छुपायी क्यों? हम तो पूरा ध्यान रख रहे है कि काशी को सेहतमंद खाना मिले फिर ये कौनसी चीज़ है जिसने बच्चे की सलामती को खतरे में डाल दिया है? ये नासिर किस चीज़ का रस लाता है रोज़ काशी के लिए?”

“पपीते और अनानस का।”
हारून मियां ये सुनते ही अचानक से बौखला गये, “ये तुमने क्या कर दिया नसरीना? एक औरत होते हुए भी तुम्हे मालूम नही कि पपीते और अनानस का रस प्रेग्नेंसी में कितना नुकसान कर सकता है? मुझे उस कम्बख्त नासिर पे गुस्सा आ रहा है कि अपनी बीवी का ध्यान वो बिना कुछ जाने समझे कैसे रख रहा था। आप बस अल्लाह से दुआ करे की काशी और बच्चा दोनो सलामत रहे। मैं मस्जिद नमाज़ पढ़ने जाता हूँ। आते हुए हाकिम साब से भी मिलता हुआ आऊंगा।”

“जी आप ध्यान से जाइयेगा। मैं अब काशी के पास चलती हूँ।”

***

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“कुछ महीनों पहले तुम्हे एक लिफाफा मिला था क्या तुम्हारे घर पे?”

“नही तो। कैसा लिफाफा?”

“कुछ महीनों पहले हम जिस हॉस्पिटल में गये थे उस हॉस्पिटल की कुछ रिपोर्ट्स होंगी। मिली नही तुम्हे?”

“नही बिल्कुल नही। क्या था उस लिफाफे में?”

“दरअसल उस वक़्त मैंने तुमसे झूठ कहा था की मुझे सिर्फ माइनर बी. पी की प्रॉब्लम है। मैं प्रेग्नेंट थी उस वक़्त नासिर।”

“ये क्या बेबाक बाते कर रही हो तुम? तुम प्रेग्नेंट होती अगर तो उसी वक्त बता देती मुझे।” नासिर बौखलाहट में किल्ले की पारी से नीचे उतर आया।
“हा देती मगर जब वो रिपोर्ट्स आयी तब मुझे बेहद गुस्सा आ रहा था तुमपे। अल्लाह कसम वो गुस्सा इतना था की जैसे तुम्हारा उसी दिन खून कर दूँ। तुमने दो औरतो की ज़िन्दगी के साथ खिलवाड़ किया है नासिर। मैने उस वक़्त ना तुम्हे मेरी प्रेग्नन्सी के बारे में बताया और ना ही ये की मैंने उस बच्चे का उसी महीने अबोर्शन करवा लिया था।”
“क्या? तुमने मुझसे बिना पूछे अबोर्शन भी करवा लिया उस बच्चे का?” नासिर उस वक्र कुछ समझ नही पा रहा था। तस्नीम की हर बात उसे अंदर से चौका रही थी अब।

“हा तो क्या करती? तुम्हारी बीवी भी उस वक़्त पेट से थी। मुझे मालूम था उस वक़्त उसे छोड़ कर मेरी ज़िम्मेदारी तो लेने से रहे तो मैंने वो बच्चा गिरा दिया लेकिन अबोर्शन के दौरान मैने उसके बाप के नाम पे तुम्हारा नाम लिखवाया और गुस्से में मैंने हॉस्पिटल में तुम्हारे ही घर का पता दे दिया।”
“तुम क्या अनाब-शनाब बक रही हो तस्नीम? तुमने मेरे घर का पता दे दिया? वही रिपोर्ट अगर अम्मी या कहकशाँ के हाथ लग गई हो अगर तो क्या होगा?” नासिर अब अपना अपराध भूल के तस्नीम पे गुस्सा हो चुका था।
“नही देखी होंगी रिपोर्ट्स उन्होंने। देखी होती अगर तो अब तक तुम्हारे घर में बखेड़ा खड़ा हो चुका होता और मेरा घर बस चुका होता। वो गवार तुम्हे छोड़ के ना चली गयी होती अब तक? शायद वो रिपोर्ट्स पहुँची ही नही है अब तक तुम्हारे घर।”
“यू आर जस्ट दिसगस्टिंग तस्नीम। तुमने मेरा घर बर्बाद करने की कोशिश की है। मैंने तुमसे ये उम्मीद नही की थी। मैं जा रहा हूँ अब यहां से। “ नासिर बिना तस्नीम की ओर देखे किल्ले के रास्ते पे नीचे की ओर चलने लगा।

तस्नीम पीछे बौखलायी हुई सी हालत मे चीखती रही, “मैंने तुम्हारी ज़िन्दगी बर्बाद की है या तुमने मेर्री? दो औरतो की ज़िन्दगियों से खेला है तु नामुराद। अल्लाह तुझे कभी माफ नही करेगा। मुझे पीठ दिखा के जा रहा है जिसने तुझे बचाने के लिए अपने बच्चे को गिरा दिया बेशरम।”

नासिर रुका नही। बारिश तेज़ शुरू हो गयी उसी वक़्त। तस्नीम को अपनी बर्बादी का एहसास हो चुका था। उसने वही खड़े रहकर कुछ देर अपने अश्को को बारिश में भीगाना मुनासिब समझ।

***

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नासिर भीगा हुआ घर पहुँचा। आज वो अनानस का रस नही लाया था साथ में। नसरीना ने किवाड़ खोला मगर नासिर से कोई बात नही की। हारून मियां अंगनाई में बैठे हुक्का फूंक रहे थे। वो भी नासिर को तंग नज़रो से ही देखते थे। नासिर फौरन अपने कमरे मे जा घुसा जहां काशी आराम कर रही थी। काशी ने जैसे ही नासिर को भीगा हुए देखा वो बड़ी मशक्कत से धीरे धीरे पलंग से उठकर तौलिया लिए नासिर ई ओर गई।

“तुम रहने दो काशी मैं देख लूँगा। पहले ही बहुत तकलीफ दे चूका हूँ मैं तुम्हे। ऐसी हालत में तुम्हे सिर्फ आराम करना चाहिए।”

“आप फिक्र ना करे।” काशी तौलिये से नासिर के बाल पोछने लगी। नासिर कुछ देर फर्श की ओर ही सुन्न अवस्था में देखता रहा फिर वैसे ही ज़मीन की ओर देखते हुए सिसकती हुई आवाज़ में बोला, “मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ काशी। मैने तुम्हारी ज़िन्दगी वरबाद की है। शायद तुम जानती हो मैंने क्या गुनाह किए है लेकिन फिर भी तुम इतने महीनों से चुप चाप बिना शिकायत किए मेरे साथ रह रही हो। तुम कोई फरिश्ता हो कहकशाँ और मैंने तुम्हारे साथ एक पल भी ठीक नही किया, एक पल भी नही।” नासिर अब फुट-फुट कर रोने लगा। काशी के हाथ भी रुक गए और वो दीवार की ओर बस देखती रही। उसे उस वक़्त अपना हर वो दर्द याद आ रहा था जो इतने महीनों में उसने नासिर की खातिर या उसकी वजह से झेला था।

नासिर उठा और घुम कर काशी कर पैरों में जा गिर पड़ा। काशी ने नासिर की ओर एक नज़र ना की और वो फिरसे पलंग पे आ कर बैठ गई। ध्यान बस वही दीवार और अपने दर्द की ओर था। नासिर बहुत देर तक फर्श पे बैठा गिड़गिड़ाता रहा फिर वहाँ से उठ कर छत पे चला गया। काशी ने उठकर दरवाज़ा बंध किया, क़ुरान की तिलावत पढ़ी और नमाज़ अदा की। काशी की आंखों में उस रात एक गज़ब का सुकून था, पलके कम झपकती थी, सिर पे चुन्नी डाले हुई थी, आंखें एक ऐसा इश्क़ बयान करती थी जिस में बस सब कुछ दे दिया गया है मगर पाया नही। लेकिन ना जाने कहा से उस रात उस बात का कोई रंज नही था उसकी आंखों में। बत्ती जलती रही रात भर, काशी अपनी माज़ी की क्रहकहशां में डूबी ना जाने कब सो गई।

***

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सुबह करीब 7 बजे कहकशाँ के कमरे से उसके दर्द की आवाज़े बाहर अंगनाई में आने लगी। नसरीना ने फौरन हारून मियां को उठाया और वे दोनो काशी के कमरे में दाखिल हुए। काशी बच्चा जंनने के दर्द से अंदर पड़ी कराह रही थी। हारून मियां नासिर को आवाज़े देने लगे। नासिर रात भर छत पे ही सोया रहा। अपने अब्बू की आवाज़ से वो तुरंत उठ खड़ा हुआ और नीचे आ पहुँचा।

“तुम जल्दी से डॉक्टर को फोन करो की काशी को प्रसव पीड़ा शुरू हो गयी है। उनसे कहो फौरन आए।”

नासिर ने अस्पताल में फोन मिला दिया। नसरीना काशी के पास बिस्तर पे बैठी उसके माथे पे फेर रही थी और दिलासे दे रही थी उसे की बस कुछ देर और ये दर्द सहना है फिर अल्लाह मियां सब ठीक कर देंगे।
करीब 20 मिनट बाद डॉक्टर साब आ पहुँचे और काशी के कंमरे का दरवाज़ा बंध हो गया। कुछ देर बाद डॉ. त्रिवेदी बाहर आए। नसरीना अपनी दुआ के इजलास में मशरूफ थी, हारून मियां अपनी कुर्सी पे बैठे हुए थे और नासिर अंगनाई में नीचे बैठा हुआ था। डॉ. त्रिवेदी ने नसरीना की ओर देखते हुए कहा, “देखिए मुझे आप सबसे एक ज़रूरी सलाह करनी है। केहकशां की हालत बेहद खराब है। हमें लगता है हम बच्चे को

बचा लेंगे मगर शायद कहकशाँ अपनी जान गवा देगी। वो इस वक़्त बेहद दर्द में है और उसका शरीर शायद इसे सहन नही कर पायेगा ज़्यादा देर। मेरा फ़र्ज़ है कि ऑपेरशन मर आगे बढ़ने से पहले आप लोगों को इस बात की इखतिला कर दूँ।”

डॉ. त्रिवेदी ये केह कर वापिस कंमरे में चले गए और बाहर एक नर्स आके खड़ी हो गई। नसरीना बी घुटनो के बल ज़मीन पे गिर पड़ी। नासिर वही खड़ा पछतावे में फुट-फुट कर रोने लगा।

हारून मियां ज़मीन पे बैठकर नसरीना को हौसला देने लगे तभी एक और नर्स बाहर आई और नसरीना से कंमरे में आने को कहा। नसरीना फौरन उठकर कमरे में चल दी।

डॉ. त्रिवेदी बोले, “कहकशाँ आपसे कुछ बात करना चाहती है। मैं बाहर जाता हूँ। ये नर्सिस यही रहेंगी।”

काशी की हालत देख नसरीना और रोने लगी और उसके पास आके उसके सिर पे हाथ फेरने लगी। काशी ने नसरीना का एक हाथ पकड़ा और सिसकती आवाज़ में बोली, “अम्मी हम चाहते है कि आप हम से एक वादा करें। मेरे जाने के बाद आप नासिर, तस्नीम और उसके बच्चे को अपना ले। मेरे बच्चे के साथ साथ आप नासिर और तस्नीम के बच्चे को भी प्यार दे। आप तस्नीम को मेरी तरह ही इज़्ज़त और प्यार दे। नासिर कभी मुझे प्यार नही कर पाए। शायद मुझ ही में कोई कमी थी मगर नासिर तस्नीम से बहुत प्यार करते है। आप वादा करे अम्मी, आप वादा करे कि आप उन दोनो को अपना लेंगी।”

नसरीना के पैरों तले मानो ज़मीन खिसक गई हो। वो कुछ कह नही पाई और बस काशी के चेहरे पे अपना सर रख फुट-फुट लर रोने लगी। उन्होंने काशी को कस के गले लगा लिया और कुछ मिनटो बाद नर्स ने नसरीना के कंधो पे हाथ रखके उसे काशी से दूर किया और कमरे से बाहर जाने को कहा। डॉ. त्रिवेदी फिरसे कमरे में दाखिल हुए। नसरीना के बाहर आते ही उसे रोता हुआ देख हारून मियां ने उसे गले से लगा लिया। तभी नसरीना चिल्लाने लगी, “इस नासपीटे से कहो की दफा हो जाए यहाँ से। मेरे अपने नामुराद बेटे की वजह से आज काशी इतने दर्द में है। ये गुनहगार है मेरी बेटी का। इसने दो औरतो की ज़िन्दगी के साथ खेला है। ये मेरा बेटा हो ही नही सकता।” हारून मियां नसरीना को शांत करते हुए उसकी पीठ थपथपा रहे थे। नासिर दीवार पे अपना सर रखे हुए खुदको कोसता हुआ तंग आवाज़ों में रो रहा था।

तभी कमरे से कहकशाँ की चीखो की आवाज़ शाँत हो गई और एक छोटे बच्चे के रोने की आवाज़े अंगनाई में गूंजने लगी।

[NOTE – All the photos and the story are original and have been created by Jagjeet Saluja and hence holds the copyright. Any kind of piracy of the story as well as the photos shall lead to legal punishment. All rights reserved. ]

One thought on “Kehkashaan – The story of Kashi

  1. Pratik says:

    The story was huge amount of emotions or women’s power value amazing it’s incredible story of every female like kashi superb

    Like

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