किवाड़

ये उन दिनों की बात है
जब तुम आया नही करते थे
मैं यूँ ही किवाड़ से आती धूप में
तुम्हारा इंतज़ार किया करती थी ।

मैं तो यही कैद रह गई
जब भी कोई आहट आती
तब कुंडी से निकलती धूल में
मेरी उम्मीदे भी ख़ाक हो जाती ।

फिर वही बच्चो सा मन मना के
पीछे वाले कमरे में आ जाया करती हूँ ।
वहाँ के लकड़ी के फर्नीचर की पोलिश में
कभी कभी तुम्हारी भी खुशबू मिल जाती है ।

शाम ढले चराग़ जला लेती हूँ
बल्ब लगे हुए है पर बस जलाने को मन नही करता ।
कोई आता जाता ही नही है मेरी रूह की दहलीज़ पे
एक बस तुम आते हो मगर फिर भी क्यूँ नही आते ?

अभी तो खुद को मना लेती हूँ
मगर जब तुम आओगे ना ?
ऐसा रूठूंगी की फिर मना ना पाओगे,
हाँ लिपट जाऊँगी तुमसे सिसकियों में ।

शब चढ़े दरीचे से
एक सहेली आ जाती है
उसका चाँद भी उसे छोड़ के
कई दिनों गायब हो जाता है
उन रूहानी रातो में घर में
पाज़ेबो की आवाज़ गूँजा करती है ।

मैं अपने ही आँचल में फिर
तुम्हारी यादो की सजावट किए सो जाती हूँ
फिर सेहेर मैं यूँ ही
किवाड़ से आती धूप में
तुम्हारा इंतज़ार किया करती हूँ ।

वो दिन आज भी वैसा ही है
जिन में तुम आते नही हो ।
एक बस तुम आते हो
मगर फिर भी क्यों नही आते ?

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